9 जनवरी 2018 - 20:04
क्या मुर्दा मुज्तहिद की तक़लीद की जा सकती है?

जो लोग मुज्तहिद जामेउश्शराएत की ज़िंदगी में नाबालिग़ रहे हों लेकिन उन्होंने सही तरीक़े से मुज्तहिद की तक़लीद की हो तो मुज्तहिद के मरने के बाद उसकी तक़लीद...................

एक हिसाब से मुर्दा मुज्तहिद की तक़लीद दो तरह से हो सकती है।
1.    इब्तेदाई (यानि मुज्तहिद की ज़िंदगी में उसकी तक़लीद किए बिना मरने के बाद उसकी तक़लीद करना) एहतियाते वाजिब  की बिना पर तक़लीदे इब्तेदाई जाएज़ नहीं है।
2.    बक़ाईः (यानि जिस मुज्तहिद की तक़लीद कर रहा था मरने के बाद भी उसकी तक़लीद पर बाक़ी रहना) सभी मसअलों में यहां तक कि उन मसअलों में भी जिनमें मुकल्लफ़ ने अभी तक अमल नहीं किया है, मुर्दा मुज्तहिद की तक़लीद जाएज़ है।
•    बक़ाई तक़लीद में मुर्दा मुज्तहिद की तक़लीद जाएज़ है चाहे वह आलम (सबसे बड़ा आलिम) हो या न हो। लेकिन एहतियात की बिना पर बेहतर यही है कि अगर मुर्दा मुज्तहिद आलम था तभी उसकी तक़लीद पर बाक़ी रहा जाए।
•    तक़लीदे इब्तेदाई या मय्यत की तक़लीद पर बाक़ी रहने के लिए ज़िंदा मुज्तहिद और एहतियाते वाजिब की बिना पर आलम की इजाज़त ज़रूरी है। हाँ अगर मय्यत की तक़लीद पर बाक़ी रहने के जाएज़ होने पर मौजूदा दौर के सभी फ़ोक़हा एकमत हों तो आलम की इजाज़त ज़रूरी नहीं है।
•    जो लोग मुज्तहिद जामेउश्शराएत की ज़िंदगी में नाबालिग़ रहे हों लेकिन उन्होंने सही तरीक़े से मुज्तहिद की तक़लीद की हो तो मुज्तहिद के मरने के बाद उसकी तक़लीद पर बाक़ी रह सकते हैं।
•    जो इंसान किसी मुज्तहिद की तक़लीद करता हो फिर उसके मरने के बाद कुछ मसअलों में किसी दूसरे मुज्तहिद की तक़लीद कर ले फिर दूसरा मुज्तहिद भी मर जाए तो जिन मसअलों में उसने दूसरे मुज्तहिद की तरफ़ उदूल (दूसरे मुज्तहिद से सम्पर्क) नहीं किया था उनमें वह पहले मुज्तहिद की तक़लीद पर बाक़ी रह सकता है। और जिन मसअलों में उसने दूसरे मुज्तहिद की तरफ़ उदूल कर लिया था उनमें उसे इख़्तियार है कि उसी मुज्तहिद के फ़तवे पर बाक़ी रहे या ज़िंदा मुज्तहिद की तक़लीद कर ले।